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चटाई वाली सविता भाभी!

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Antarvasna Village Sex Story : चटाई वाली विधवा भाभी का फटा ब्लाउज और बिना ब्रा की देखीं चुचियाँ! चाय देने के बहाने दिखाया खड़ा लंड! और बिछाया चूत पेलने का जाल!

मेरा नाम अमेय है। मैं महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर में रहता हूँ। यह कहानी मेरी है, और घर-घर जाकर चटाई बेचने वाली एक गाँव की भाभी की। उनका नाम सविता है।

यह कोई मनगढ़ंत बात नहीं। एक-एक शब्द उस जीवन से उठा है जो मैंने खुद जिया। कहानी थोड़ी लंबी है क्योंकि मैंने हर बारीकी लिखी है। उम्मीद है मेरा यह अनुभव आपको भी बैठे।

सविता हर रविवार हमारे घर आती थीं। माँ-पापा दोनों जॉब करते थे, इसलिए पूरा घर बस रविवार को ही इकट्ठा होता था। वो चार-पाँच साल से आ रही थीं। माँ उनसे चटाई, गलीचा खरीदतीं। धीरे-धीरे दोनों की गहरी दोस्ती हो गई।

एक-दूसरे के घर की बातें, पति क्या करता है, बच्चे क्या करते हैं — सब खुलकर चलता था। सविता का पति बहुत शराब पीता था, इसलिए उसके पास कहने को हमेशा ज्यादा रहता। अगर मैं घर पर होता तो बिना झिझक सुनने बैठ जाता।

घर की हालत ठीक नहीं थी। कमाई अकेली सविता की थी। पति पहले काम पर जाता था, शराब की वजह से निकाल दिया गया। जो पैसा आता, वही शराब में उड़ जाता। एक बेटी थी, स्कूल जाती थी। पूरा बोझ सविता पर था।

चटाई बेचकर, पति से छुपाकर पैसा जमा करतीं और घर सँभालतीं।

दिन बीतते गए। मैं पच्चीस का हो गया। नजर अब औरत की सुंदरता ढूँढ़ने लगी थी। तीन साल बाहर शहर में सीखने गया था। गर्मी की छुट्टियों में घर आया। सविता धुंधली-सी याद थी।

एक रविवार, ग्यारह बजे घंटी बजी। माँ घर पर थीं, पापा काम पर निकले थे। मैंने दरवाजा खोला तो सामने सविता भाभी — सिर पर चटाइयों का ढेर, पसीने से तर। एक हाथ ढेर थामे, दूसरा दीवार पर टिका। खड़ी होने का अंदाज ही अलग था।

नजर उनके ब्लाउज पर गई। बगल से कपड़ा फटा हुआ था, बगल के बाल बाहर आए हुए। पता नहीं क्यों, वो बात अच्छी लगी। चार-पाँच सेकंड वहीं अटकी रही नजर। स्तन पहले से बड़े लग रहे थे।

साड़ी थोड़ी नीचे बँधी थी, नाभि साफ दिख रही थी। दिमाग चकरा गया।

तभी उन्होंने पूछा, “अमेय? ये तुम हो? कितने दिनों बाद देखा। कितने बड़े हो गए हो। थोड़े मोटे भी। थोड़ा एक्सरसाइज किया करो।” इतना कहकर हँसते हुए अंदर आ गईं।

माँ अभी अंदर से नहीं आई थीं। सोचा, मजाक कर लूँ। खुद को सँभाला और बोला, “हाँ भाभी, छुट्टियाँ शुरू हुईं तो घर आ गया। वैसे आप भी पहचान में कम आ रही हो। आप भी बदली हो। मोटापा आपको भी चढ़ा है। लेकिन पहले से सुंदर भी लग रही हो।”

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वो एकदम देखती रह गईं, फिर जोर से हँस पड़ीं। मैं भी मुस्कुराया। तभी माँ आ गईं।

“अरे आ जा, बैठ सविता। देख, मेरा बेटा आया है। पहचान हो रही है?” ये Desi Sex Ki Hindi Sex Kahani आप गरमकहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है!

सविता बोलीं, “कितना बड़ा हो गया है। एकदम सुंदर दिख रहा है। पहली नजर में पहचाना ही नहीं। कॉलेज की लड़कियाँ जरूर इस पर मरती होंगी। देख लेना।”

दोनों हँस पड़ीं। मैं शर्मा गया। वो हमेशा एक-दूसरे के साथ ऐसे ही मजाक करतीं। सविता जमीन पर ही बैठती थीं। आज भी नीचे बैठ गईं। माँ ने पानी लाने को कहा।

मैंने गिलास भरा और देने गया। वो नीचे थीं, ब्लाउज साइज से छोटा था। पूरा क्लीवेज खुल गया। चड्डी के अंदर लंड हल्का उभर आया। शायद उन्हें भी एहसास हो गया, या मेरी नजर उनके गोल स्तनों पर टिकी देख ली।

उन्होंने झट से पल्लू ब्लाउज पर डाल दिया। दूसरे हाथ से गिलास लिया। नजरें टकराईं। सविता गाल में मुस्कुरा रही थीं। नजरें चुराईं और पानी पीने लगीं। गिलास लेते समय उनकी उंगलियाँ जाने-अनजाने मेरे हाथ से लगीं।

करंट-सा दौड़ा। पराई औरत का वो पहला स्पर्श मैं आज तक नहीं भूलता।

लगभग एक घंटा वो माँ से बातें करती रहीं। मैं निहारता रहा। बीच-बीच में मुझे देखकर हल्की मुस्कुराहट देतीं, फिर माँ से बात जोड़ लेतीं। उन्हें अहसास था कि मैं घूर रहा हूँ। थोड़ी असहज भी होंगी।

माँ दूसरे सोफे पर थीं। चुगली और घर की बातों में उनका ध्यान मुझ पर नहीं था। हमारी निगाहों की भिड़ंत बार-बार हो रही थी।

जुड़ा बँधा था। माथे पर बिंदी, माँग भरी, आँखों में काजल, नाक में छोटी बाली। रंग साँवला-गेहुआँ। चेहरे पर एक दाग नहीं जो सुंदरता को काटे। ब्लाउज पुराना और पतला हो चुका था।

अंदर का धुंधला आकार दिख रहा था। ब्रा का रंग देखने की चाह बैठ गई। कुछ भी हो, पास जाकर एक बार और देख लूँ — बस यही चल रहा था मन में।

तभी माँ बोलीं, “बेटा, आधा-आधा हम दोनों के लिए चाय बना देगा?” अकेले रहने की वजह से खाना-चाय आती थी। सविता फॉर्मेलिटी में बोलीं, “नहीं-नहीं, उसको क्यों तकलीफ दे रही हो।”

माँ ने कहा, “एक बार इसके हाथ की चाय पीकर देख, मजा आ जाएगा।” वो मना न कर सकीं।

चाय बन गई। पहले माँ को दी, फिर सविता के पास गया। कंधे पर ब्रा की पट्टी देखने की कोशिश की। वहाँ कुछ नहीं था। चौंक गया। अंदर कुछ पहना ही नहीं था। उत्तेजना और चढ़ गई।

उन्होंने चाय ली, थोड़ा घूरा, फिर मुस्कुराईं। पल्लू ओढ़ने के बाद भी स्तनों का आकार नहीं छुपा। लग रहा था ब्लाउज का बटन किसी भी पल टूट जाएगा। एक स्तन तरबूज जितना।

छाती स्तनों से भरी हुई। स्तनों के बाद एक-दो उँगली छोड़कर नाभि। पेट पर एक तिल साफ था। धूप से चेहरा साँवला, पेट की तरफ रंग गोरा। मन ही मन स्तन, चुचियाँ, जाँघें घूमने लगीं।

सविता बोलीं, “अमेय, चाय बहुत अच्छी बनाई है। मैं ऐसी नहीं बना पाती। जो लड़की तुम्हें पाएगी, वो खुश रहेगी।” माँ हँसीं। मैं शर्मा गया। फिर वो उठीं, “चलो दीदी, निकलती हूँ। देर हो गई।” चटाइयाँ बाँधने लगीं।

माँ ने कहा, “ठीक है, मुझे भी खाना बनाना है। आ जाना वापस। अगली बार तुझे खुशखबरी देनी है। अभी मत पूछ।” कप उठाकर अंदर गईं और जाते-जाते मुझसे कहा, “जाए तो दरवाजा बंद कर देना।”

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सविता बोलीं, “दीदी आप भी ना, अब अगली बार वो बात सुने बिना चैन नहीं पड़ेगा। ठीक है, चलती हूँ।” मुझे देखकर हँसीं।

मैंने माँ को आवाज दी, “क्या बात है, मुझे भी बताओ।” तभी सविता बोलीं, “अमेय, ये चटाई उठाने में थोड़ी मदद करो।”

मैं ढेर उठाने झुका। वो भी झुकीं। पल्लू कंधे से फिसल गया। आँखें खुली की खुली रह गईं। ब्रा न होने की वजह से उभरी चुचियाँ साफ दिख रही थीं।

दोनों स्तनों पर बड़ा काला घेरा, बीच में खड़ी चुचियाँ - धुंधली नहीं, साफ। उन्होंने झट पल्लू सँभाला, नजरें चुराईं। शर्माते हुए जल्दी दरवाजे की तरफ बढ़ीं। उस वक्त मुझे देखा तक नहीं।

मुड़ीं तो बहुत बड़ी गांड दिखाई दी। मन में आया - इसे मारने मिले तो क्या जीवन हो। ये Antarvasna Bhabhi Sex With Devar Ki Chudai Ki Kahani आप गरमकहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है!

लंड को ऊपर से सहलाया, दरवाजा बंद किया, दौड़कर बालकनी गया। नीचे गेट से निकलकर उन्होंने ऊपर देखा। उम्मीद नहीं थी मैं वहाँ हूँ। चौंक गईं, नीचे देखा, हँसते हुए चली गईं।

तुरंत माँ के पास गया। पीछे पड़ा रहा तो बताया, “तेरी बहन पेट से है। पाँचवा महीना लगने वाला है। हमें उसके पास जाना होगा।” मामा बनने की खुशी हुई।

उस दिन के बाद सविता नहीं गई दिमाग से। कितनी बार उनकी कल्पना करके मुठ मारी। हाथ से संतोष नहीं हो रहा था। लंड को अब चूत चाहिए थी।

उस रविवार के बाद कई हफ्ते सविता आईं ही नहीं। आस छोड़ दी। छुट्टियाँ खत्म होने के करीब मैं वापस चला गया। चार-पाँच महीने बाद एक दिन वो अचानक आईं।

उस समय मैं गाँव आया हुआ था, लेकिन घर पर नहीं था। बाद में माँ ने बताया, “वो आकर चली गईं। मैंने तेरी दीदी के बारे में बताया, मिठाई भी खिलाई। सविता तेरे बारे में पूछ रही थी।”

यह सुनते ही लंड में हल्का उभार आया। जो यादें धुंधली पड़ गई थीं, ताजा हो गईं। उनके गोल स्तन, बड़ी गांड — फिर से महसूस हुए। माँ आगे बोलीं, “सुन, अगले हफ्ते निकलना है तेरी बहन के शहर। सामान पैक कर लेना। डिलीवरी है। पंद्रह-बीस दिन उधर रहना पड़ेगा।”

मैंने पूछा, “वो भला मेरे बारे में क्या पूछ रही थीं? आज क्या-क्या बातें हुईं, थोड़ा बताओ।”

माँ ने कहा, “कुछ खास नहीं। तू कहीं दिख नहीं रहा था तो पूछ रही थीं कहाँ है। और… बेचारी के साथ बहुत बुरा हुआ।” यह कहते हुए उनकी आँखें भर गईं।

“क्या हुआ माँ? बताओ ना जल्दी।”

“बेचारी का पति गुजर गया। याद है पिछली बार जब तू आया था, तब वो आई थीं। उसके दो दिन बाद ही उसका पति चला गया।”

“बहुत बुरा हुआ।” मुँह से निकला, लेकिन अंदर अफसोस जरा भी नहीं था।

मन कह रहा था - ऐसी फिगर वाली पत्नी हो तो शराब को हाथ भी न लगाऊँ। दिन भर चुचियाँ मुँह में लिए बैठूँ, स्तन दबा-दबाकर और भर दूँ, गांड पकड़कर ऐसी चोदूँ कि सात पुश्तें याद रखें। अफसोस सिर्फ इतना था कि वो मुझे नहीं मिली। वरना खुशी-खुशी शादी कर लेता।

इसी खयाल के साथ एक आइडिया कौंधा। अगर अगले हफ्ते मैं घर पर रह गया तो? माँ-पापा जाएँगे ही। सविता और मैं घर में अकेले रहेंगे। उस समय मन की बात कह सकूँगा। खुद को शाबाशी दी। बस कुछ करके यहीं रुकना था।

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दिन बीतते गए। निकलने का कल तय था। रेलवे की बुकिंग हो चुकी थी। मैंने बैग भरकर ऐसा रेडी रखा कि जानबूझकर कुछ किया हो, पता न चले। रात खाने पर अचानक सिर पर हाथ रखा, टेंशन का नाटक किया।

माँ झट पूछीं, “बेटा, क्या हुआ? कोई परेशानी है?” पापा भी देखने लगे।

“माँ, कॉलेज का एक सबमिशन था। भूल गया। तीन दिन में पूरा करके देना है, वरना मैडम फेल कर देंगी।”

पापा खुद बोल उठे, “तो वहाँ आने की कोई जरूरत नहीं। यहीं बैठ, पढ़ाई कर। यही तेरी सजा है अब।” माँ कुछ न बोल सकीं।

“ठीक है। बस अपना ख्याल रखना। कुछ लगे तो बाजू वाली आंटी से माँग लेना। और सुन, मैं तेरी मामी को डिब्बा देने को कह देती हूँ। वहाँ जाकर ले आना।”

मुराद पूरी होने वाली थी। “माँ, चिंता मत कर। सब सँभाल लूँगा। अच्छे मार्क्स लाने हैं इस बार। वरना मैं भी साथ चल पड़ता।” दोनों खुश हो गए। खाना शांति से हुआ। सब सो गए।

पूरी रात नींद नहीं आई। क्या होगा, कैसे होगा, अगर मना कर दिया तो, अगर माँ को कह दिया तो - बवाल, घर से बाहर का रास्ता। सुबह टैक्सी बुक की, उन्हें रेलवे पर बिठाया, वापस आया। शनिवार था। अब बस कल का इंतजार। सविता हर रविवार आती थीं।

शाम होते-होते मैं बिस्तर पर लेटा सविता भाभी के खयाल में डूबा। लंड बाहर निकाला, शीशे में देखा। उन्हें सोचते-सोचते छह इंच का लंड तन गया, शीशे में समा ही नहीं रहा था।

दस-पंद्रह मिनट हाथ चलाया, सविता का नाम लेते-लेते हाथ पर ही झाड़ दिया। बहुत दिनों बाद हिलाया था। गाढ़ा, गरम वीर्य निकला। कंट्रोल नहीं रह रहा था।

मन में खयाल आने लगे - कल आई ही नहीं तो? दिल की बात कह दी और मना कर दिया तो? माँ को बता दिया तो?

आगे की कहानी :-

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यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें दिखाए गए पात्र और घटनाएँ वास्तविक नहीं हैं। साइट केवल 18 वर्ष या अधिक आयु के पाठकों के लिए है।

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