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भाई-बहन

माँ के फोन पर भाई ने मारी गांड!

13 मिनट पढ़ें

चुदक्कड़ फॅमिली सेक्स स्टोरी : भाई ने बहन की फाड़ी टाइट गांड! तभी माँ का आया फोन! खुद चुदते हुई बोली - मदारचोद आराम से चोद! पूरे गाँव से नहीं चुदवा रही! बहनचोद!

नमस्कार दोस्तों। मेरा नाम काव्या राठौर है। उम्र तेईस। लोग कहती हैं सुंदर हूँ, स्मार्ट हूँ… सेक्सी भी। एक भाई है - रोहन, छब्बीस का। हम माता-पिता के साथ सिंगापुर में रहते हैं।

पापा एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर हैं। जब मैं दसवीं में थी, पापा सबको साथ लेकर यहाँ आ गए थे। भारत कभी-कभी जाना होता है। अब दस साल हो गए, सब यहीं के माहौल में रंग चुके हैं।

हमारे घर में सेक्स छुपा हुआ नहीं है। माँ सुनीता आज भी दो-तीन लोगों से एक साथ चुद जाती हैं। पापा विक्रम देखते हैं, कभी शामिल होते हैं। रोहन और मैं भी उसी बिस्तर का हिस्सा हैं। सब कुछ ओपन है।

एक कमरे में चारों कराह सकते हैं और सुबह नाश्ते पर जैसे कुछ हुआ ही न हो। मगर आज सिंगापुर वाली रात नहीं बता रही। आज वो चुदाई बता रही हूँ जो भारत में मामी के घर हुई।

उस साल दीवाली पर हम जयपुर उतरे। मामा अशोक गाड़ी लेकर एयरपोर्ट बाहर खड़े थे। गाँव करीब अठारह किलोमीटर था। पीछे वाली सीट पर मैं स्कर्ट में थी।

रोहन ने आधा रास्ता चुपचाप काटा, फिर हथेली स्कर्ट के अंदर सरका दी। पैंटी के ऊपर से चूत सहलाई, फिर किनारे हटाकर दो उंगलियाँ अंदर कर दीं।

मैंने दाँत भींचे। “रोहन… मामा देख लेंगे…”

“देखे तो क्या, घर का है।” उंगलियाँ और गीली जगह में घुमने लगीं। “तेरी चूत सिंगापुर से ही भीगी हुई है काव्या।”

आह्ह्ह निकल गई, दबी हुई। माँ ने शीशे में देखा। गुस्सा नहीं था, सिर्फ हिसाब था। “घर पहुँच जाएँ, वहाँ कर लेना। इतनी जल्दी क्या है।”

रोहन है ही पैदाइशी कमीना। माँ की बात पर रुकने की बजाय दूसरी तरफ बढ़ा। सुनीता की सलवार के ऊपर से उनकी चूत दबाने लगा। माँ ने साँस ली, आगे वाले दोनों को देखकर आवाज सँभाली। “रोहन… पापा बात कर रहे हैं…”

आगे मामा गाड़ी चला रहे थे। पापा बातें जोड़ रहे थे। “साले साहब, जिंदगी कैसी चल रही है?”

“सब ठीक-ठाक जीजा जी। आप बताओ।”

“हमारा क्या है। तुमने बहन ऐसी दी कि दिल भरता ही नहीं। हर रात सुहागरात जैसी लगती है। तुम्हारी सेक्स लाइफ कैसी चल रही है?”

मामा चुप रहे। कुछ नहीं बोला। सिर्फ हॉर्न बजाया और गाँव की तरफ मोड़ लिया। पीछे रोहन की उंगली माँ की सलवार के कपड़े के अंदर तक चली गई थी। माँ ने उसकी कलाई पकड़ी, हटाया नहीं।

बस फुसफुसाया, “पहुँचकर हिसाब ले लूँगी।”

घर बहुत बड़ा था। मामा के पूर्वज जमींदार थे। अब बस मामा और मामी रेखा रहते हैं। गाँव की दो औरतें काम को आती हैं - एक रसोई, एक झाड़ू-पोंछा। रोहन ने उन्हें पहले दिन से ही आँखों से नाप लिया।

मैंने कोहनी मारी। “पहले घर तो देख ले कमीने।”

दूसरे दिन दोपहर का खाना हुआ। मामा शहर निकले — पार्टी की सभा थी, देर शाम तक आने वाले नहीं थे। पापा नीचे मामी और माँ के साथ बैठे चाय की बातें करने लगे। रोहन ने मुझे आँख दिखाई। ऊपर के फ्लोर की तरफ।

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ऊपर कई बंद कमरे थे, गलियारा लंबा, धूल की हल्की गंध। जैसे ही सीढ़ियाँ खत्म हुईं, रोहन ने कमर पकड़कर दीवार से सटाया। किस गहरा था, जीभ मुँह में घुस गई। मैं छूटकर भागी, वो पकड़कर फिर किस करने लगा।

यह हमारा तरीका है - भागना, पकड़ना, साँस फूलना, फिर कपड़े ढीले पड़ना। कामोत्तेजना इसी से चढ़ती है।

तीसरे कमरे के बाहर एक पुरानी लकड़ी की मेज थी। पीछे से उठाया, मेज पर बिठाया। नाइट ड्रेस का पजामा एक झटके में नीचे आया, पैंटी साथ निकल गई। ठंडी लकड़ी गांड से लगी। रोहन घुटनों के बल बैठा और जीभ चूत पर फेर दी।

“आह्ह्ह… रोहन… वहीं… अह्ह्ह…”

पैर अपने आप खुल गए। बाल पकड़कर उसके मुँह को और चूत से सटाया। हाथ ऊपर गए, चूचियाँ नाइट के ऊपर से दबने लगीं। दस मिनट भी नहीं लगे। कमर अकड़ी, चूत फड़की, मैं झड़ गई।

रोहन ने सारा माल चाट-चाटकर साफ किया, ठोड़ी चमक रही थी।

मैं मेज से उतरी, उसके नीचे बैठ गई। पैंट खोली। साला कभी चड्डी पहनता ही नहीं। लंड मुँह में लिया, लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी।

गप… गप… गला भर गया। कुछ मिनट बाद रोहन ने बाल पकड़कर रोका। टी-शर्ट उतारी, मुझे खंभे से सटा दिया। एक टांग उठाई, लंड चूत के मुँह पर रखा।

“थूक लगा… अह्ह्ह रोहन धीरे…”

“तेरी चूत सिंगापुर में कितनी बार खुल चुकी है काव्या। आज पहले शॉट का चीखना सुनना है।”

एक झटका। पूरा अंदर। चीख निकल गई — “आह्हhhhh… साले… इतना जोर से…” खंभा पीठ में गड़ा, चूत फैल गई। फिर करारे धक्के।

फच-फच घर की खाली दीवारों में गूँजने लगी। मैं घोड़ी हुई। दस मिनट बाद दूसरी बार झड़ गई। चूत इतनी भीगी कि हर धक्के पर आवाज और तेज हो गई।

रोहन ने लंड निकाला। नोक गांड के छेद पर टिकी। गांड अभी टाइट है — इसमें अब तक एक ही लंड गया है, पापा का। वो एक अलग कहानी है, कभी बाद में बताऊँगी।

चूत का पानी लंड पर लगा था, इसलिए घुसने में उसे दिक्कत न हुई। मुझे फटने जैसा दर्द हुआ।

“आह्ह्ह… रोहन निकाल… गांड फट गई… अह्ह्ह धीरे…”

दो मिनट रुका, फिर आराम-आराम अंदर-बाहर करने लगा। तभी उसका फोन बजा। हाथ बढ़ाया, जमीन पर पड़ी पैंट से निकाला, लंड गांड में लगे-लगे ही उठाया।

“हाँ माँ…” सुनते-सुनते मुस्कुराया। फोन रखा। फिर से धक्के शुरू किए।

मैंने हाँफते पूछा, “कौन थी?”

झटके मारते बोला, “माँ थी। गाली दे रही थीं — मादरचोद, आराम से चोद। उस साली से बोल पूरे गाँव से नहीं चुद रही जो इतनी आवाज कर रही है।”

हँसी दर्द के बीच निकल गई। माँ को मेरी चीख सुनाई पड़ गई थी। नीचे क्या चल रहा था, तब तक पूरा अंदाजा नहीं था।

रोहन ने स्पीड बढ़ा दी। लंबे झटके, गांड सुजती गई, आवाज रुकने का नाम नहीं ले रही थी। माँ हमेशा कहती हैं पापा ने नानी को भी ऐसे ही चोदा था - वही बात दिमाग में आई और कराह और फूट पड़ी।

“आह्ह्ह… भर… गांड में छोड़… अह्ह्ह रोहन…”

आखिरी शॉट गहरा गया। गरम माल गांड में छूटा। रोहन जमीन पर बैठ गया। मैं उसके लंड पर बैठ गई, दोनों चूमने लगे। पसीना, वीर्य, चूत का पानी - सब मिला हुआ था।

रोहन ने कान में कहा, “चल, जल्दी कपड़े पहन। नीचे रंडीबाजी चल रही है। जब माँ ने फोन किया था ना… उनकी किसी से चुदने की आवाज साफ आ रही थी।”

मैंने नाइट सँभाली। गलियारे के सिरे से नीचे सीढ़ियाँ दिख रही थीं। और नीचे से… मामी रेखा की दबी चीख, माँ की गाली, और किसी तीसरे मर्द की साँस।

घर बड़ा था। मामा अभी शहर में थे।

और हम दोनों ऊपर खड़े थे, गांड अभी भरी हुई, कान नीचे की तरफ।

हमने कपड़े जैसे-तैसे सँभाले। नाइट की पैंटी कहीं मेज के नीचे रह गई थी, पहनने का समय नहीं था। रोहन की पैंट अधूरी थी, लंड अभी भी आधा तना गांड के पानी से चमक रहा था।

सीढ़ियाँ धीरे उतरीं। हर कदम पर नीचे की आवाज साफ होती गई।

लिविंग रूम का दरवाजा आधा खुला था। सोफे पर मामी रेखा नंगी लेटी थीं — उम्र चालीस के करीब, भारी गांड, काले निप्पल, जाँघों पर माँ के नाखून के निशान। पापा विक्रम उनके ऊपर थे।

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लंड मामी की चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। फच-फच। मामी की आवाज दबी थी, हाथ मुँह पर।

“आह्ह्ह… जीजा… धीरे… कोई आ जाएगा… अह्ह्ह…” ये Antarvasna Hindi Sex Kahani जिसमे Parivarik Chudai Ki Kahani है को गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!

माँ सुनीता सोफे के आर्म पर बैठी थीं। साड़ी कमर तक उठी हुई, ब्लाउज खुला, एक हाथ अपनी चूत में, दूसरा पापा की कमर पर। वो देख रही थीं। निर्देश दे रही थीं। “और गहरा विक्रम।

रेखा की चूत सूखी नहीं रहनी चाहिए आज। अह्ह्ह… हाँ… वहीं…”

रोहन ने मेरा हाथ दबाया। हम पर्दे के पीछे रुक गए। माँ ने फोन करते वक्त सच कहा था — वो चुद नहीं रही थीं उस वक्त, देख रही थीं। अब खुद को रोक नहीं पा रही थीं।

पापा ने लंड निकाला, मामी को घुमाया, घोड़ी बनाया। गांड पर थप्पड़ पड़ा। मामी चीखीं — “आह्हhhhh… जीजा जी… गांड मत… अह्ह्ह…”

पापा हँसे। “गांड नहीं, चूत ही ले रहा हूँ अभी। गांड का हिसाब रात को।” फिर घुसाए। माँ उनके पास खिसकीं, अपना स्तन पापा के मुँह में दे दिया। पापा चूसते हुए धक्के लगा रहे थे। माँ की निगाह अचानक ऊपर सीढ़ियों पर गई।

हम दोनों दिख गए।

माँ ने पलक नहीं झपकाई। बस मुँह से निकला, “आ गई हो? ऊपर कितना शोर मचाया था दोनों ने। आवाज पूरे आँगन तक गई होगी। कामवाली औरतें अभी पीछे हैं, भगवान करे उन्होंने न सुना हो।” फिर हाथ से इशारा किया।

“यहाँ आओ। खड़े-खड़े देखने से काम नहीं चलेगा।”

रोहन पहले बढ़ा। मैं पीछे। मामी ने हमें देखा तो शर्म से मुँह छुपाना चाहा, लेकिन पापा ने कमर पकड़ रखी थी, भाग नहीं सकती थीं। “सुनीता… बच्चे… अह्ह्ह…”

“बच्चे नहीं हैं रेखा। सिंगापुर में ये दोनों मुझसे और विक्रम से चुद चुके हैं। आज तुम्हारी बारी है देखने की… और अगर हिम्मत हो तो लेने की।” माँ ने मेरी नाइट का पल्लू खींचा। पैंटी नहीं थी।

चूत अभी भी भीगी, गांड से रोहन का माल धीरे-धीरे जाँघ पर बह रहा था। माँ की उंगली वहाँ लग गई। “गांड भी ले ली इसने। अच्छा किया। पापा की दी हुई सील के बाद दूसरा लंड भी पच गया।”

मैं बोल न सकी। सिर्फ अह्ह्ह निकला जब माँ की उंगली गांड के गिला छेद में घुसी। रोहन ने पहले से पैंट उतार दी थी। माँ ने उसका लंड हाथ में लिया, चूत के पानी और गांड के वीर्य से अभी भी चिकना था।

“इसी से मामी को दिखा। धीरे। पहली बार है इनके लिए ये नजारा।”

पापा रुक नहीं रहे थे। मामी की चूत में धक्के और तेज हो गए। “आह्ह्ह… विक्रम… मैं झड़ने वाली हूँ… अह्ह्ह जीजा…” मामी का शरीर काँपा। पानी सोफे पर फैल गया।

पापा ने बाहर निकाला, माल उनकी गांड की दरार पर छोड़ दिया, फिर हाथ से फैलाया।

रोहन को माँ ने आगे धकेला। “रेखा की चूत अब खाली है। डाल।”

मामी ने सिर हिलाया — मना नहीं, बस डर। “बेटा… तुम्हारी उम्र… अह्ह्ह… सुनीता…”

माँ ने उनके बाल पकड़े। “उम्र की बात मत कर। लंड देख। काव्या की गांड अभी इससे भरी पड़ी है।”

रोहन ने लंड मामी की गीली चूत पर रखा। मैंने माँ का हाथ पकड़ा, खुद उनके बगल में बैठ गई। माँ ने मेरी चूत में दो उंगलियाँ कर दीं, साथ में अपना निप्पल मेरे मुँह की तरफ किया।

मैं चूसने लगी - घर वाली आदत। नीचे रोहन घुसा। मामी की चीख निकल गई।

“आह्हhhhh… इतना मोटा… अह्ह्ह रोहन धीरे…”

पापा पीछे खड़े होकर माँ के स्तन मसल रहे थे, मेरी कमर पर भी हाथ था। चारों तरफ साँसें, फच-फच, गांड पर थप्पड़। माँ ने मेरे कान में कहा, “आज रात मामा आने वाले हैं।

तब तक ये सोफा और ऊपर वाला कमरा दोनों गंदे हो चुके होंगे। तू चुप रहना। रेखा भी चुप रहेगी। समझी?”

मैंने सिर हिलाया, मुँह माँ के स्तन से लगा। रोहन मामी को चोद रहा था — पहले धीरे, फिर उसी फेवरिट शॉट से जिसने ऊपर मेरी गांड फाड़ी थी। मामी अब खुद गांड पीछे कर रही थीं।

“आह्ह्ह… और… अह्ह्ह बेटा… चूत फाड़… अह्ह्ह…”

पापा ने माँ को सोफे के किनारे लिटाया। माँ की सलवार पहले से नीचे थी। पापा ने लौडा घुसाया!

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माँ चीखीं - वही आवाज जो फोन पर रोहन को सुनाई दी थी। “

मादरचोद

… आराम से नहीं… आज पूरी तरह… अह्ह्ह विक्रम…”

मैं माँ की चूत और पापा के लंड के जोड़ को देख रही थी। रोहन ने मामी के बाल पकड़कर एक हाथ से मुझे भी पास खींचा। तीनों औरतों की कराहें एक हो गईं। कमरे में पंखे की आवाज दब गई थी।

बीस मिनट बाद रोहन मामी की चूत में झड़ गया। निकाला नहीं, अंदर ही छोड़ा। मामी हांफ रही थीं, आँखें बंद। माँ पापा के नीचे दूसरी बार झड़ चुकी थीं।

मैं अभी पूरी तरह नहीं चुदी थी नीचे - सिर्फ उंगलियाँ और स्तन। भूख बाकी थी।

तभी आँगन में गाड़ी का हॉर्न बजा। दूर से। अभी गेट तक नहीं। मामा की गाड़ी जैसी आवाज थी।

सब एक साथ थमे। पापा लंड निकालकर पैंट ढूँढ़ने लगे। माँ साड़ी सँभालने लगीं। मामी कंबल खींचने लगीं। रोहन ने मुझे आँख दिखाई - ऊपर भागो।

हम सीढ़ियाँ दो-दो करके चढ़ीं। पीछे माँ की फुसफुसाहट आई, “कपड़े ठीक करो रेखा। मुँह धो लो। अशोक को कुछ नहीं पता चलना चाहिए… आज रात के लिए।”

ऊपर वाले कमरे में हम दोनों दरवाजा बंद करके दीवार से लग गए। मेरी गांड अभी भी चिपचिपी थी। रोहन का लंड फिर तन रहा था। खिड़की से नीचे गेट दिख रहा था। मामा की सफेद स्कॉर्पियो मुड़कर अंदर आ रही थी।

रोहन ने मेरे कान में कहा, “मामा आ गए। आज रात रुकना पड़ेगा। कल सुबह वो फिर सभा में निकलेंगे।” हाथ मेरी नंगी चूत पर था। “कल ऊपर ही नहीं… शायद रसोई वाली औरत भी।”

मैंने होठ भींचे। नीचे दरवाजा खुला। मामा की आवाज आई - “मैं आ गया। खाना रखा है?”

मामी की आवाज सामान्य हो चुकी थी। “हाँ… रख दिया है। आप हाथ-मुँह धो लीजिए।”

हम दोनों ऊपर अंधेरे में खड़े थे। घर फिर सामान्य दिखने वाला था।

लेकिन सोफे पर अभी भी गीले धब्बे थे। मामी की चूत में रोहन का माल था। मेरी गांड में भी। और माँ की निगाह, जब वो सीढ़ियों की तरफ एक बार और उठीं, वो वादा नहीं था। वो हिसाब था।

कल सुबह मामा निकलेंगे।

कामवाली औरतें आयेंगी। और यह घर फिर से वही खुलेगा जो सिंगापुर वाले घर की तरह खुलता है - धीरे, फिर पूरी तरह।

दोस्तों, मामी के घर की ये पहली दोपहर थी। रात और अगला दिन… वो अभी बाकी है।

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यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें दिखाए गए पात्र और घटनाएँ वास्तविक नहीं हैं। साइट केवल 18 वर्ष या अधिक आयु के पाठकों के लिए है।

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